भगवान को भोग लगाये

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तुलसी का पौधा कहां लगाएं

Story  –भगवान को भोग लगाये

भगवान को भोग लगाये

पति के प्रमोशन की खुशी में शीला ने अपने पति गौरव से मन्दिर चलने की बात कहते भगवान् को प्रसाद चढ़ाने की इच्छा व्यक्त की ।

पति गौरव ने भी प्रसन्नता प्रगट करते कहा कि हाॅ भगवान् ने कृपा की है उनके दर्शन को जाना ही है।

चलो आज शाम को ही चलते है।शाम को खुशी मन से शीला, गौरव अपने बच्चों सहित भगवान के दर्शन के लिए चल दिए ।

वहां पहुंच मन्दिर के प्रांगण में लगी दुकानों से खोवे के पेड़े के दो पैकेट, नारियल, और भी पूजन सामग्री ले वे मंदिर की तरफ बढ़े ।

मंदिर के द्वार के सामने पहुंचने पर उनने देखा ।

एक आदमी ,दो बच्चों को जो लगभग आठ -दस साल के थे ,उन्हें डांटते मंदिर के अन्दर न आने की हिदायत दे रहा था ।वे बच्चे भी घबराये सीढ़ियों से उतर कर बाहर एक तरफ खड़े हो गये ।

शीला और गौरव वही खड़े हो कर क्या बात है हो गई , सोच बच्चों की तरफ देखने लगे। बच्चों का पहनावा ही उनकी दरिद्रता बयान कर रही थी ।

वे बच्चे भी भयभीत से उनके तरफ देखते जाने को हुए ,उन बच्चों ने मुॅह से तो कुछ नही कहा पर उनकी कातर द्दष्टि ने जैसे सब कुछ कह दिया ,जाने कैसा दर्द था उनकी ऑखों में कि शीला का हद्धय द्रवित हो उठा ।

शीला, गौरव समझ गये कि बच्चे भूखे है ,अन्दर प्रसाद के लालच में

चले गये होयेंगे तो मन्दिर के कर्मचारी ने इन्हें वहां से भगाया है।

शीला ने जाते बच्चों को रोकते थैले से मिठाई का पैकेट निकाल उसमे से दो, दो पेड़े बच्चों के हाथ में रख दिया ।

शीला ने देखा उन बच्चों ने एक पेड़ा खा ,दूसरा कमीज की जेब रख लिया । शीला ने आश्चर्य से पूछा बच्चों तुमने पेड़े जेब में क्यों रखा ?

उसमें से एक बालक जो बड़ा था बोला घर में छोटी बहन और माॅ है उनके लिए ,कह चलने को हुआ ।शीला ने उसे रोकते कहा ठहरो और चार पेड़े उसके हाथ में रखते कहा ये तुम्हारी माॅ और बहन के लिए साथ ही पर्स से बीस का नोट निकाल कर देते कहा ये पैसे लो माॅ को देना वे तुम्हारे लिए खाने का कुछ ले देवेगी

बच्चों को जो आशा नहीं थी वह मिल गया ,उनकी ऑखों की खुशी देखते बनती थी ।वे मुॅह से तो कुछ नहीं बोल पाये पर उनकी खुशी से भरी ऑखों में शीला के प्रति कृतज्ञता झलक रही थी ।वे अपने घर के लिए दौड़ पड़े ।

शीला अपने से बोली चलो अन्दर चलते है ।पति गौरव बोला तुमने भगवान को भोग लगाये बिना ही उन बच्चों को पेड़े दे दिया ।शीला पति की ओर शान्त भाव से देखते बोली भगवान् को भोग तो तभी लग गया था जब हमने मन से विचार करते भोग के लिए सामान लिया ।बाकी तो सब औपचारिकता ही होती है ।गौरव , शीला की बात की गहराई को समझते कहा तुम ठीक कहती हो ।

लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा के सामने पहुंच सबने प्रभु को प्रणाम करते ,पूजन सामग्री व लाई गई मिठाई पुजारीजी को प्रभु को भोग लगाने हेतु दिया ।

शीला ने अपने बच्चों को हाथ जोड़ भगवान से प्रार्थना के लिए कहते स्वंय भी हाथ जोड़ ,नीले बल्व के प्रकाश में लक्ष्मीनारायण की अद्भुत शोभा निहारती ऑखे मूंद प्रार्थना करने लगी

। अचानक उसे लगा कि वे दोनों बच्चे जिन्हें पेड़े दिये थे , वे उसके सामने खड़े है ।

उसने अचकचा कर ऑखे खोली तो कोई नहीं था , थी तो सामने लक्ष्मी नारायण की दिव्य प्रतिमा थी । देखते -देखते शीला को आभास सा हुआ कि साक्षात् लक्ष्मी नारायण मधुर -मधुर मुस्कान से मुस्काते कह रहे है

कि मैंने भोग ग्रहण कर लिया ।

शीला का शरीर रोमांचित हो उठा और भाव भक्ति से पूरित हद्धय से आनन्द के अश्रु नेत्रों से निकल पड़े ।

भगवान को भोग लगाये

Story  -भोग

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